Spread the love*वीरता स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक थे महाराणा प्रताप : पुष्पराज सिंह* महाराणा प्रताप और उनके सैनिकों ने अद्भुत साहस का दिया था परिचय : शैलेंद्र सिंह बबली शंकरगढ़(प्रयागराज) भारत के इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने साहस ,त्याग और राष्ट्रप्रेम से आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का मार्ग प्रशस्त किया । ऐसे ही महान योद्धाओं में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है । महाराणा प्रताप केवल मेवाड़ के शासक ही नहीं थे, बल्कि वे भारतीय स्वाभिमान, स्वतंत्रता और अदम्य साहस के जीवंत प्रतीक थे । उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण मातृभूमि, संस्कृति और सम्मान की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया । यही कारण है कि सदियों बाद भी उनका नाम करोड़ों भारतीयों के हृदय में श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है । उक्त बातें विकास खंड शंकरगढ़ के प्रधान संघ अध्यक्ष पुष्पराज सिंह ने कहीं, उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था । वे मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के महान शासक थे । उनके पिता महाराणा उदयसिंह द्वितीय और माता जयवंता बाई थीं । बचपन से ही प्रताप में वीरता, नेतृत्व क्षमता और स्वाभिमान के गुण दिखाई देने लगे थे । कहा जाता है कि उन्होंने अपनी माता से ही साहस, शौर्य और युद्धकला की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की थी । आगे चलकर यही गुण उन्हें भारतीय इतिहास के सबसे महान योद्धाओं में शामिल करने वाले बने । वहीं ग्राम सभा चुन्दवा प्रधान शैलेन्द्र सिंह बबली ने कहा कि महाराणा प्रताप की जयंती को लेकर देशभर में विशेष उत्साह रहता है । अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार उनका जन्म 9 मई 1540 को हुआ था, इसलिए अनेक स्थानों पर इसी दिन जयंती समारोह आयोजित किए जाते हैं । वहीं मेवाड़ क्षेत्र में सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार उनकी जयंती हिन्दू पंचांग की ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया तिथि को मनाई जाती है । वर्ष 2026 में यह तिथि 17 जून को पड़ी है । मेवाड़ के लोगों के लिए यह केवल एक जयंती नहीं बल्कि अपनी गौरवशाली विरासत और संस्कृति का उत्सव है । शैलेंद्र सिंह बबली ने बताया कि महाराणा प्रताप का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था । जब वे मेवाड़ के शासक बने, उस समय मुगल सम्राट अकबर अपनी सत्ता का विस्तार कर रहा था । अधिकांश राजपूत राजाओं ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी, लेकिन महाराणा प्रताप ने अपने स्वाभिमान और स्वतंत्रता से कभी समझौता नहीं किया । अकबर ने कई बार दूत भेजकर उन्हें अपनी अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव दिया, किंतु प्रताप ने हर बार उसे अस्वीकार कर दिया । उनका मानना था कि मातृभूमि की स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर नहीं बेची जा सकती । महाराणा प्रताप और अकबर के बीच संघर्ष का सबसे प्रसिद्ध अध्याय हल्दीघाटी का युद्ध है । *रिपोर्ट -/ विकास पटेल* *शंकरगढ़* Post Views: 2 Post navigation सुप्रसिद्ध मेकअप आर्टिस्ट तनु धामा हुई नीरा अमृत सम्मान से सम्मानित अधिकारियों ने ताजियादारों से की संवाद,शांति और सौहार्द के साथ त्योहार मनाने की अपील