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कुछ लोग “खामख्वाह” (बेवजह) परेशान रहते हैं…

श्रमिक उजाला समाचार

“खामख्वाह” (बेवजह) भी एक अजीब बीमारी है। इसका कोई इलाज मेडिकल स्टोर पर नहीं मिलता, लेकिन इसके मरीज सोशल मीडिया से लेकर राजनीति तक हर जगह मिल जाएंगे। जिस बात से उनका कोई लेना-देना नहीं होता, उसी पर सबसे ज़्यादा ज्ञान और सबसे ज़्यादा चिंता दिखाई देती है।

अब देखिए… सोशल मीडिया पर चर्चा है कि आमिर खान ने तीसरी शादी की। शादी में उनकी पहली और दूसरी पत्नी भी शामिल हुईं, उनके बच्चे भी मौजूद रहे। जिस परिवार को इस व्यवस्था से कोई परेशानी नहीं है, उसके बाहर वाले सबसे ज़्यादा परेशान हैं। यही तो खामख्वाह (बेवजह) परेशान होने की पराकाष्ठा है।

ज़रा एक महीना पीछे चलिए। राम मंदिर के चढ़ावे का मुद्दा उठा। राजनीतिक बयान आए, जांच हुई, कार्रवाई हुई, मुकदमे दर्ज हुए और जिम्मेदार पदाधिकारियों में बदलाव भी हुआ। राजनीति करने वालों का काम राजनीति करना है, इसलिए उनका बयान देना स्वाभाविक है। लेकिन कुछ लोग (धर्म विशेष) ऐसे भी मैदान में उतर आए जिनका उस पूरे मामले से कोई सीधा संबंध ही नहीं था। यह भी खामख्वाह (बेवजह) परेशान होने का शानदार उदाहरण है।

इसी बीच हिंदूवादी नेता पिंकी चौधरी की एक बात काफी चर्चा में रही। उनका सीधा-सा तर्क था—”जब आपने चंदा नहीं दिया, हिसाब मांगने वाले आप कौन?” यह बात कई लोगों को कड़वी लग सकती है, कई लोग इससे असहमत भी हो सकते हैं, लेकिन उनका सवाल यही था कि जिस विषय से आपका सीधा संबंध नहीं है, उसमें खामख्वाह (बेवजह) इतनी बेचैनी क्यों? कम से कम उन्होंने अपने पक्ष को बिना लाग-लपेट के रखा।

कुछ दिन पहले एक युवक पर सोशल मीडिया पोस्ट के कारण मुकदमा दर्ज हो गया। (सबूत कमेंट में) वजह? वही खामख्वाह (बेवजह) की सक्रियता। बिना पूरी जानकारी, बिना तथ्य, बस टिप्पणी करनी है, बहस करनी है और माहौल बनाना है।

राजनीति में भी यह “खामख्वाह” खूब दिखाई देता है।

देश-दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल की बात करें तो एक तरफ समान नागरिक संहिता, सामाजिक सुधार और धार्मिक प्रतीकों पर बड़े-बड़े विचार रखे जाते हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक कार्यक्रमों (हालिया लखनऊ की तस्वीर कमेंट में) में पहचान के आधार पर लोगों को आगे बैठाने या प्रतीकात्मक उपस्थिति दिखाने की तस्वीरें भी सामने आती हैं। यदि सिद्धांत एक हैं तो उनका पालन हर मंच पर समान रूप से दिखना चाहिए, नहीं तो लोग पूछेंगे कि यह सब खामख्वाह (बेवजह) क्यों?

असल समस्या यही है कि हम अपनी जिंदगी से ज्यादा दूसरों की जिंदगी में रुचि लेने लगे हैं। कौन किससे शादी करे, कौन किसके साथ रहे, कौन क्या पहने, कौन किस धर्मस्थल पर जाए—इन सब पर फैसला सुनाने वालों की कमी नहीं है।

इसलिए आखिर में बस एक सवाल…

अगर जिस व्यक्ति, परिवार या संस्था को कोई परेशानी नहीं है, तो हम खामख्वाह (बेवजह) क्यों परेशान हैं?

कभी-कभी सबसे समझदारी का काम यह होता है कि जिस विषय से हमारा कोई लेना-देना नहीं है, उसमें दर्शक बने रहें, न्यायाधीश नहीं।

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