Spread the loveहादसा, अभियान और फिर खामोशी! आखिर कब टूटेगा व्यवस्था का यह चक्र? लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। इस हादसे में 15 युवाओं की मौत हो गई। इनमें अधिकांश की उम्र 19 से 21 वर्ष के बीच बताई गई। कई घायल हुए, कई परिवारों के सपने राख हो गए। जिन घरों के चिराग बुझ गए, उन घरों का दर्द शायद वही समझ सकते हैं। मोमबत्तियां जलाकर श्रद्धांजलि दी जा सकती है, शोक व्यक्त किया जा सकता है, लेकिन किसी मां-बाप का बेटा, किसी बहन का भाई और किसी परिवार का भविष्य वापस नहीं लाया जा सकता। हादसे के बाद सरकार सक्रिय हुई। मुख्यमंत्री के निर्देश पर एसआईटी का गठन हुआ। भवन स्वामी समेत चार लोगों की गिरफ्तारी हुई। कई अधिकारियों को निलंबित किया गया। प्रदेशभर में फायर सेफ्टी ऑडिट शुरू हुआ। कोचिंग संस्थानों, होटलों, गेस्ट हाउसों, लॉजों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की जांच के आदेश दिए गए। सरकार की यह सक्रियता स्वागत योग्य है। किसी भी हादसे के बाद जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए और सुरक्षा मानकों की समीक्षा भी जरूरी है। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है। आखिर हर बार कार्रवाई किसी बड़े हादसे के बाद ही क्यों शुरू होती है? लखनऊ हादसे के बाद प्रदेशभर में लगभग 48 कोचिंग संस्थानों को सील किया गया। कानपुर में 30 कोचिंग संस्थानों पर कार्रवाई हुई। हापुड़ में 5, वाराणसी में 2, नोएडा में 2 और मथुरा में 1 कोचिंग संस्थान सील किए गए। कई जिलों में नोटिस जारी हुए, बिजली कनेक्शन काटे गए और फायर ऑडिट शुरू हुआ। प्रयागराज में भी अभियान चला। सिविल लाइंस स्थित एक बड़े कोचिंग संस्थान पर सीलिंग की कार्रवाई हुई। कई अन्य संस्थानों की जांच शुरू हुई। होटल, गेस्ट हाउस और बैंक्वेट हॉलों की समीक्षा की गई। स्थानीय स्तर पर यह जानकारी सामने आई कि लगभग 86 होटल, गेस्ट हाउस और उत्सव गृह ऐसे मिले जिनके खिलाफ कार्रवाई, नोटिस अथवा पंजीकरण निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई। यहीं से असली सवाल शुरू होता है। यदि इतने बड़े पैमाने पर कमियां मौजूद थीं तो ये कमियां आखिर आज की नहीं थीं। इन भवनों को किसी न किसी स्तर पर अनुमति मिली होगी। कहीं न कहीं नक्शा पास हुआ होगा। कहीं न कहीं फायर एनओसी जारी हुई होगी। कहीं न कहीं निरीक्षण हुआ होगा। फिर वर्षों तक यह सब कैसे चलता रहा? क्या लखनऊ की घटना न होती तो ये संस्थान ऐसे ही चलते रहते? यह सवाल केवल अग्निशमन विभाग से नहीं है। यह सवाल विकास प्राधिकरणों से भी है। यह सवाल नगर निकायों से भी है। यह सवाल उन तमाम विभागों से है जिनकी जिम्मेदारी सुरक्षा मानकों का पालन कराना है। प्रयागराज में कुछ समय पहले एक होटल में आग लगी थी। सौभाग्य से कोई जनहानि नहीं हुई। उसके बाद भी निरीक्षण हुए, नोटिस जारी हुए। लेकिन कुछ समय बीतते ही मामला फिर सामान्य हो गया। इससे पहले भी कई शहरों में होटलों, अस्पतालों और व्यावसायिक इमारतों में आग लगने की घटनाएं सामने आती रही हैं। यही स्थिति स्वास्थ्य विभाग में भी देखने को मिलती है। किसी अस्पताल में लापरवाही से मौत होती है तो जांच समिति बनती है। रिपोर्ट तैयार होती है। कुछ दिनों तक चर्चा होती है। फिर मामला धीरे-धीरे फाइलों में दब जाता है। जहरीली शराब से मौतें होती हैं तो आबकारी विभाग अभियान चलाता है। कुछ दिनों तक छापेमारी होती है। फिर हालात पहले जैसे होने लगते हैं। यानी हादसा होता है, अभियान चलता है, नोटिस जारी होते हैं, सुर्खियां बनती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं और फिर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता है। सवाल यह नहीं है कि कार्रवाई क्यों हो रही है। सवाल यह है कि कार्रवाई पहले क्यों नहीं होती? क्या सुरक्षा मानकों का पालन कराने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार जरूरी है? क्या निरीक्षण केवल दुर्घटना के बाद ही याद आते हैं? क्या नोटिस तभी जारी होंगे जब किसी परिवार का चिराग बुझ जाएगा? व्यवस्था में नियमों की कमी नहीं है। कानून भी हैं, विभाग भी हैं और अधिकारी भी हैं। लेकिन आम लोगों के बीच यह धारणा लगातार मजबूत होती जा रही है कि फाइलों और नियमों के बीच कहीं न कहीं एक ऐसा तंत्र भी मौजूद है जो नियमों को कागजों तक सीमित रखता है। जब तक कोई बड़ा हादसा नहीं होता, तब तक सब कुछ ठीक दिखाई देता है। हादसा होते ही वही भवन, वही संस्थान और वही व्यवस्थाएं अचानक खतरनाक घोषित हो जाती हैं। लखनऊ की घटना ने एक बार फिर पूरे सिस्टम के सामने आईना रख दिया है। जरूरत केवल अभियान चलाने की नहीं है। जरूरत यह सुनिश्चित करने की है कि अभियान खबरों की सुर्खियों तक सीमित न रह जाएं। क्योंकि जब अगली बार कोई हादसा होगा, तब फिर जांच होगी, फिर नोटिस जारी होंगे, फिर अभियान चलेगा और फिर वही पुराना सवाल सामने खड़ा होगा— अगर कार्रवाई पहले हो जाती, तो क्या कुछ जिंदगियां बच सकती थीं? Post Views: 35 Post navigation प्रशिक्षण प्राप्त कर पूरी संवेदनशीलता के साथ जन सेवा करें, खंड विकास अधिकारी भिटरिया चकमार्ग कब्जा: कार्रवाई नहीं हुई तो धरना देगा भाकियू भानु