गंगा एक्सप्रेसवे- आखिरकार गंगा एक्सप्रेसवे के उद्घाटन का फीता कट गया। 594 किलोमीटर का एक्सप्रेस वे जिसमें से 92 किलोमीटर का हिस्सा बदायूं की छाती चीरकर निकला।
मंच से ‘विकास की गंगा’ बहा दी गई, तालियों की गड़गड़ाहट में अफसरों/ जन प्रतिनिधियों के सीने चौड़े हो गए। सवाल ये है एक्स प्रेस वे बदायूं से गुज़रा है, या बदायूं को रौंदकर गुज़रा है? उद्घाटन का शोर, ज़मीन की चीख कौन सुने? विकास के नाम पर जिन किसानों की ज़मीन छीनी गई, उन्हें ‘मुआवज़े का लॉलीपॉप’ देकर चुप कराया गया। जो वृक्ष 50 से 100 साल में बड़े हुए थे,उन्हें 10 मिनट में काट दिया गया।‘विकास’ के नाम पर गांवों के रास्ते बंद, खेत के टुकड़े हुए, और बदले में मिला डिवाइडर के उस पार देखने का सपना। टोल प्लाज़ा पर पर्ची कटेगी बदायूं की ज़मीन की, और मुनाफा जाएगा लखनऊ-दिल्ली के बिल्डरों की तिजोरी में। उद्योग आएंगे, रोजगार आएगा, होटल-ढाबे खुलेंगे।हकीकत ये है कि पहले उद्योग आएंगे, वेयरहाउस बनेंगे, फिर लोकल दुकानदार साफ होजाएंगे। जो किसान आज ‘एक्सप्रेसवे के किनारे प्लॉट’ के सपने बेच रहा है, कल वही अपने खेत में चौकीदार बनकर खड़ा मिलेगा। उद्घाटन के बाद का सन्नाटा सबसे खतरनाक हैl रिबन कटते ही नेता-मंत्री हेलीकॉप्टर में उड़ गए और पीछे छोड़ गए, उड़ती धूल, टूटी संपर्क सड़कें, और ‘कब मिलेगा फायदा’ पूछते लोगl अगले 5 साल में बदायूं में एक भी बड़ी फैक्ट्री, एक भी बड़ा उद्योग,एक भी लॉजिस्टिक हब नहीं आया, तो समझ लेना, ये एक्सप्रेसवे नहीं, बदायूं की पीठ पर मारा गया ‘विकास का कोड़ा’ था।594 किमी का एक्सप्रेसवे इतिहास है, पर 92 किमी बदायूं का भविष्य क्या है?अगर बदायूं को सिर्फ ‘गुज़रने का जिला’ बनाकर छोड़ दिया गया, तो ये उद्घाटन नहीं, बदायूं के साथ ‘हाईवे पर हुआ एक सिर्फ़ एक धोखा है, इस्तेमाल करो और आगे बढ़ जाओ।विकास वो नहीं जो दिल्ली की स्पीड बढ़ाए।
विकास वो है जो बदायूं के युवाओं को बदायूं में ही रोजगार दे और पलायन से रोक ले,नहीं तो ये गंगा एक्सप्रेसवे नहीं, बदायूं से ‘पलायन एक्सप्रेसवे’ कहलाएगा, जहां से जवानी, ज़मीन और ज़मीर तीनों गुज़र जाएंगे… वापस लौटने के लिए नहीं।
