Spread the loveअगर हर नीति रिश्तेदारी के लिए बनती है, तो फिर… *लईक के “लेख”* इन दिनों सोशल मीडिया पर पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) को लेकर तरह-तरह के दावे और आरोप वायरल हैं। कुछ लोग यह आरोप भी लगा रहे हैं कि यह फैसला किसी मंत्री के बेटे की कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए लिया गया। इन दावों की सत्यता अपनी जगह है और इनके समर्थन में कोई ठोस प्रमाण सामने आए बिना इन्हें तथ्य नहीं माना जा सकता। लेकिन अगर कुछ देर के लिए इसी आरोप को सच मान लिया जाए, तो फिर कल्पना कीजिए कि आगे क्या-क्या हो सकता है? अगर किसी मंत्री के बेटे की चीनी मिल हो, तो शायद आदेश आ जाए कि हर चाय में दो चम्मच अतिरिक्त चीनी डालना अनिवार्य है। अगर बेटे की नमक फैक्ट्री हो, तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह भूल जाइए, हर खाने में 20% अतिरिक्त नमक मिलाना “राष्ट्रीय हित” घोषित कर दिया जाए। अगर बेटे की मिर्च फैक्ट्री हो, तो हर मसाले में तीखापन बढ़ाना देशभक्ति की नई परिभाषा बन जाए। और अगर, भगवान न करे, किसी के बेटे की ज़हर बनाने वाली फैक्ट्री होती, तो शायद कोई यह भी कह देता कि हर खाद्य पदार्थ में 20% “स्लो पॉइज़न” मिला दो—एक तरफ कंपनी चलेगी, दूसरी तरफ जनसंख्या नियंत्रण का लक्ष्य भी पूरा हो जाएगा! बेशक, यह सिर्फ़ व्यंग्य है। किसी पर आरोप नहीं, बल्कि उस सोच पर कटाक्ष है जिसमें हर सरकारी निर्णय के पीछे किसी रिश्तेदार का फायदा तलाश लिया जाता है। लोकतंत्र में सवाल पूछना नागरिक का अधिकार है, लेकिन सवालों का आधार प्रमाण होना चाहिए। अगर किसी नीति से तकनीकी या आर्थिक नुकसान हो रहा है, तो उसकी आलोचना तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि अफवाहों के सहारे। और यदि कभी सचमुच किसी सरकार की नीतियां केवल रिश्तेदारों के कारोबार को बढ़ाने के लिए बनने लगें, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र नहीं, पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चल रही है। इसलिए न अंधभक्ति ठीक है, न अंधविरोध। सरकारें जवाबदेह रहें, जनता जागरूक रहे और फैसले जनहित में हों—यही लोकतंत्र की असली ताकत है। Post Views: 21 Post navigation पैतृक जमीनी विवाद में बहू ने ससुर पर लोहे की रॉड से किया हमला, एफआईआर दर्ज बारा ने सम्बंधित थाना में पत्र भेजकर एफआईआर दर्ज कराने के संकेत मिले