पीयूष दीक्षित ब्यूरो चीफ लखीमपुर खीरी दैनिक श्रमिक उजाला समाचार पत्र
संसारपुर,खीरी। पारस्परिक मेल-मिलाप, उमंग और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक होली का स्वरूप समय के साथ तेजी से बदलता नजर आ रहा है। कभी गांवों की चौपालों में गूंजने वाले फगुआ गीत अब धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। उनकी जगह डीजे, तेज ध्वनि विस्तारक यंत्र, हुड़दंग और नशाखोरी ने ले ली है। आधुनिकता के रंग में रंगती होली में परंपरागत संस्कृति की छवि धुंधली पड़ती दिखाई दे रही है।
पूर्व समय में होलिका दहन एक सामूहिक और धार्मिक अनुष्ठान के रूप में आयोजित होता था। ग्रामीण एकत्र होकर देवी-देवताओं का स्मरण करते थे और ब्राह्मणों द्वारा विधि-विधान से मंत्रोच्चारण के बीच होलिका दहन संपन्न होता था। अगले दिन प्रातः लोग दहन स्थल पर पहुंचकर राख का तिलक लगाते और शुभकामनाओं के साथ रंगोत्सव की शुरुआत करते थे।

सियाराम दीक्षित का कहना
सियाराम दीक्षित बताते हैं कि दो दशक पूर्व तक होली सामूहिकता और संस्कारों का पर्व हुआ करती थी। बुजुर्ग, युवा और बच्चे एक साथ बैठकर पारंपरिक होली गीत गाते थे। महिलाएं भी गीत सुनने के लिए चौपालों तक पहुंचती थीं। आज भी कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत धुनें सुनाई देती हैं, किंतु अधिकांश स्थानों पर डीजे का शोर और अश्लील गीतों ने वातावरण को प्रभावित किया है। उनका मानना है कि गीतों की शालीनता और सांस्कृतिक गरिमा अब समाप्ति के कगार पर है।

जगदीश सिंह ने कहा
जगदीश सिंह के अनुसार पूर्व समय में होलिका दहन की तैयारी लगभग एक माह पहले से शुरू हो जाती थी। गांव के एक निर्धारित स्थान पर ही दहन किया जाता था। युवा टोली ढोल-नगाड़ों के साथ घर-घर जाकर फगुआ गाती और गोइठा व लकड़ी का संग्रह करती थी। होलिका दहन के साथ ही हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार नववर्ष के आगमन की भावना भी जुड़ी रहती थी। यह केवल पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का उत्सव होता था।

राम भरोसे यादव की राय
राम भरोसे यादव बताते हैं की फाल्गुन मास लगते ही गांव में उत्साह का माहौल बन जाता था। शाम ढलते ही होली गीत गाने वालों की टोलियां सक्रिय हो जाती थीं और देर रात तक देवी-देवताओं पर आधारित गीत गूंजते रहते थे। “होली खेलें रघुबीरा अवध में”, “काहे की बनी पिचकारी” जैसे गीत वातावरण को भक्तिमय और आनंदमय बना देते थे। आज के दौर में लोग मोबाइल के माध्यम से बधाई संदेश भेजकर औपचारिकता निभा लेते हैं।
ग्रामीणों का मानना है। कि बदलती जीवनशैली और तकनीकी प्रभाव के कारण होली की पारंपरिक पहचान कमजोर पड़ रही है। सामूहिक गायन, आपसी मेलजोल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की जगह अब व्यक्तिगत उत्सव और दिखावा अधिक देखने को मिलता है।
जरूरत है कि नई पीढ़ी को सांस्कृतिक विरासत से जोड़कर होली के मूल स्वरूप को पुनर्जीवित किया जाए, ताकि यह पर्व केवल रंगों का नहीं बल्कि संस्कारों और सौहार्द का भी प्रतीक बना रहे।
